नौकरानी ने चूत की सील तुड़वाई
हैलो दोस्तो.. मेरा नाम विकास है हमारे घर में एक नौकरानी है जिसका नाम बबीता है, बबीता को हमारे घर वाले गाँव से लाए थे, उसकी उम्र मेरे बराबर ही थी और हम दोनों एक साथ ही जवान हुए थे। बबीता का बदन भी अब एकदम खिल चुका था, उसकी चूचियाँ काफी बड़ी और चूतड़ एकदम मस्त हो गए थे। मैं भी जवान हो चुका था और दोस्तों से चुदाई के बारे में काफी जान चुका था.. पर कभी किसी लड़की को चोदने का मौका नहीं मिला था।
बबीता हमेशा मेरे सामने रहती थी जिसके कारण मेरे मन में बबीता की चुदाई के ख्याल आने लगे। जब भी वो झाड़ू - पोंछा करती, मैं चोरी - चोरी उसकी चूचियों को देखता था हर रात बबीता के बारे में ही सोच सोच कर मुठ्ठ मारता था।
मैं हमेशा बबीता को चोदने के बारे में सोचता तो रहता था पर कभी न मौका मिला न हिम्मत हुई। एक बार बबीता एक महीनों के लिए अपने गाँव गई हुई थी जब वो वापस आई तो पता चला कि उसकी शादी तय हो गई थी। मैं तो बबीता को देख कर दंग ही रह गया, हमेशा सलवार-कमीज़ पहनने वाली बबीता अब साड़ी में थी, उसकी चूचियाँ पहले से ज्यादा बड़ी लग रही थीं। शायद कसे हुए ब्लाउज के कारण या फिर सच में बड़ी हो गई थी। उसके चूतड़ पहले से ज्यादा मज़ेदार दिख रहे थे और बबीता की चाल के साथ उसकी बाल्टी बहुत मटकती थी।
बबीता जब से वापस आई थी उसका मेरे प्रति नजरिया ही बदल गया था। अब वो मेरे आस -पास ज्यादा मंडराती थी। झाड़ू - पोंछा करने के समय कुछ ज्यादा ही चूचियाँ झलकाती थी। मैं भी उसके मज़े ले रहा था पर मेरा लंड बहुत परेशान था उसे तो बस बबीता की चूत चाहिए थी। मैं अब मौके की तलाश में रहने लगा। कुछ दिनों के बाद मेरे मम्मी - पापा को किसी रिश्तेदार की शादी में एक हफ्ते के लिए जाना था। अब एक हफ्ते मैं और बबीता घर में अकेले रहने वाले थे।
हमारे घर वालों को हम पर कभी कोई शक नहीं था। उन्हें लगता था कि हम दोनों के बीच में ऐसा कुछ कभी नहीं हो सकता इसलिए वो निश्चिंत होकर शादी में चले गए।
जब मैं दोपहर को कॉलेज से वापस आया तो देखा की बबीता रसोई में थी, उसने केवल पेटीकोट और ब्लाउज पहना हुआ था। उस दिन गर्मी भी बहुत ज्यादा थी और बबीता से गर्मी शायद बर्दाश्त नहीं हो रही थी।
बबीता की गोरी कमर और मस्त चूतड़ों को देख कर मेरा लंड झटके देने लगा।
मैं आगे वाले कमरे में जाकर बैठ गया और बबीता को खाना लाने को कहा।
जब बबीता खाना ले कर आई तो मैंने देखा कि उसने गहरे गले का ब्लाउज पहना हुआ है जिसमें से उसकी आधी चूचियाँ बाहर दिख रही थीं।
उसकी गोरी गोरी चूचियों को देख कर मेरा लंड और भी कड़ा हो गया और मेरे पैंट में तम्बू बन गया।
मैं खाना खाने लगा और बबीता मेरे सामने सोफे पर बैठ गई, उसने अपना पेटीकोट कमर में खोंश रखा था जिससे उसकी चिकनी टाँगें घुटने तक दिख रही थीं।
खाना खाते हुए मेरी नज़र जब बबीता पर गई तो मेरे दिमाग सन्न रह गया। बबीता सोफे पर टाँगें फैला कर बैठी थी और उसका पेटीकोट जांघों तक उठा हुआ था। उसकी चिकनी जाँघों को देखकर मुझे लगा कि मैं पैंट में ही झड़ जाऊँगा।
उधर बबीता मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी, उसने पूछा और कुछ लोगे क्या विकास?
मैंने ‘ना’ में सर हिलाया और चुपचाप खाना खाने लगा।
खाना खाने के बाद मैं अपने कमरे में चला गया तो बबीता मेरे पीछे-पीछे आ गई।
उसने मुझसे पूछा - क्या हुआ विकास?? खाना अच्छा नहीं लगा क्या?
मैंने बोला - नहीं बबीता!!! खाना तो बहुत अच्छा था।
फिर बबीता बोली - फिर इतनी जल्दी कमरे में क्यों आ गए जो देखा वो अच्छा नहीं लगा क्या?
यह बोलते हुए बबीता ने अपनी बुर पर पेटीकोट के ऊपर से हाथ रख दिया।
अब मैं इतना तो बेवक़ूफ़ नहीं था कि इशारा भी नहीं समझता। मैं समझ गया कि बबीता भी चुदाई का खेल खेलना चाहती है मौका भी अच्छा है और लड़की भी चुदवाने को तैयार थी।
मैंने धीरे से आगे बढ़कर बबीता को अपनी बाँहों में भर लिया और बिना कुछ बोले उसके होंठों को चूमने लगा।
बबीता भी मुझसे लिपट गई और बेतहाशा मुझे चूमने लगी - विकास मैं तुम्हारी प्यास में मरी जा रही थी मुझे जवानी का असली मज़ा दे दो!!!
बबीता बोल रही थी!! मैंने बबीता को अपनी गोद में उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया।
फिर मैं उसके बगल में लेट कर उसके बदन से खेलने लगा। मैंने उसके ब्लाउज और पेटीकोट उतार दिए और खुद भी नंगा हो गया।
बबीता ने मेरे लंड को अपने हाथ में भर लिया और उससे खेलने लगी - हाय विकास!!! तुम्हारा लंड तो बड़ा मोटा है आज तो मज़ा आ जाएगा।
बबीता अब सिर्फ काली ब्रा और चड्डी में थी। उसके गोरे बदन पर काली ब्रा और चड्डी बहुत ज्यादा सेक्सी लग रही थी।
मैंने शुरूआत तो कर दी थी पर मैं अभी भी कुंवारा था लड़की चोदने का मुझे कोई अनुभव तो था नहीं।
शायद मेरी झिझक को बबीता समझ गई उसने बोला - विकास तुम परेशान मत हो मैं तुम्हें चुदाई का खेल सिखा दूँगी तुम बस वैसा करो!! जैसा मैं कहती हूँ!! दोनों को खूब मज़ा आएगा।
बबीता ने खुद अपनी ब्रा खोल कर हटा दी, उसके गोरे-गोरे चूचे आज़ाद हो कर फड़कने लगे, गोरी चूचियों पर गुलाबी निप्पल्स ऐसे लग रहे थे जैसे हिमालय की छोटी पर किसी ने चेरी का फल रख दिया हो।
बबीता ने मुझे अपनी चूचियों को चूसने के लिए कहा। मैंने उसकी दाईं चूची को अपने मुँह में भर लिया और बच्चों की तरह चूसने लगा साथ ही साथ मैं दूसरे हाथ से उसकी बाईं चूची को मसल रहा था। बबीता अपनी आँखें बंद कर के सिसकारियाँ भर रही थी। फिर मैंने धीरे-धीरे अपना हाथ उसकी चड्डी की तरफ बढ़ाया। बबीता ने चूतड़ उठा कर अपने चड्डी खोलने में मेरी मदद की। बबीता की बुर देख कर मैं दंग रह गया। एकदम गुलाबी!! चिकनी बुर थी उसकी!! झांटों का कोई नामो - निशान भी नहीं था।
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इस गुलाबी बुर के साथ मैं क्या करूँ। बबीता मेरी दुविधा को भांप गई। उसने मेरा मुँह पकड़ कर अपनी बुर पर चिपका दिया और बोली- विकास!! चाटो मेरी बुर को अपने जीभ से मेरी बुर को सहलाओ।
मैंने भी आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसकी बात मानी और उसकी नमकीन बुर को चाटने लगा। उसकी बुर का अलग ही स्वाद था ऐसा स्वाद जो मैंने जिंदगी में कभी नहीं चखा था क्योंकि वो स्वाद दुनिया में किसी और चीज में होती ही नहीं है।
मैं जानवरों की तरह उसकी बुर को चाट रहा था और अपने जीभ से उसकी गुलाबी बुर के भीतर का नमकीन रस पी रहा था।
बबीता की सिसकारियाँ बढ़ती ही जा रही थीं और उन्हें सुन-सुन कर मेरा लंड लोहे की तरह कड़ा हो गया था।
दस मिनट के बाद बबीता बोली- विकास अब मेरी बुर की खुजली बर्दाश्त नहीं हो रही!!! इसमें अपना लंड पेल दो और मेरी बुर की आग शांत करो।
मैंने जैसे ब्लू-फिल्मों में देखा था वैसे करने लगा, बबीता के दोनों पैरों को फैलाया और अपना लंड उसकी बुर में घुसाने की कोशिश करने लगा।
कुछ तो बबीता की बुर कसी हुई थी कुछ मुझे अनुभव नहीं था। इसलिए मेरी पूरे कोशिश के बावजूद भी मेरा लंड अन्दर नहीं जा रहा था।
मैं अपने आप भी झेंप सा गया, मेरे सामने बबीता अपनी टाँगों को फैला कर लेटी थी और मैं चाह कर भी उसे चोद नहीं पा रहा था।
बबीता मेरी बेचारगी पर हँस रही थी, वो बोली - अरे मेरे बुद्धू राजा!!! इतनी जल्दीबाज़ी करेगा तो कैसे घुसेगा!! जरा प्यार से कर!! थोड़ा अपने लंड पर क्रीम लगा!! और फिर मेरे छेद के मुँह पर अपना पप्पू टिका!! फिर मेरी कमर पकड़ के पूरी ताकत से पेल दे अपने हथियार को!!!
मैंने वैसे ही किया अपने लंड पर ढेर सारी क्रीम लगाई फिर उसकी दोनों टाँगों को पूरी तरह चौड़ा किया और उसकी बुर के मुँह पर अपने लंड का सुपारा टिका दिया।
बबीता की बुर बहुत गर्म थी ऐसा लग रहा था जैसे मैंने चूल्हे में लंड को डाल दिया हो।
फिर मैंने उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ा और अपनी पूरी ताकत से पेल दिया।
बबीता की बुर को चीरता हुआ मेरा लंड आधा घुस गया, बबीता दर्द से चिल्ला उठी उई.. माँ.. आराम से.. अभी मेरी बुर कुंवारी है। जरा प्यार से डालो!! चूत फाड़ दोगे क्या।
मैंने एक और जोर का धक्का लगाया और मेरा 8 इंच का लंड सरसराता हुआ बबीता की बुर में घुस गया।
बबीता बहुत जोर से चीख उठी। मैं घबरा गया। देखा तो उसकी बुर से खून निकलने लगा था।
मैंने डरते हुए पूछा - बबीता!! बहुत दर्द हो रहा है क्या? मैं निकाल लूँ बाहर?
बबीता कराहते हुए बोली - ओह्ह.. अरे नहीं.. ये तो पहली चुदाई का दर्द है ये तो हर लड़की को होता है पर बाद में जो मज़ा आता है। उसके सामने ये दर्द कुछ नहीं है बबीता के कहने पर मैंने धीरे-धीरे धक्के लगाना शुरू कर दिया। बबीता की बुर से निकलने वाले काम रस से उसकी बुर बहुत चिकनी हो गई थी और मेरा लंड अब आसानी से अन्दर - बाहर हो रहा था। मैंने धीरे - धीरे पेलने की रफ़्तार बढ़ा दी। हर धक्के के साथ बबीता की मादक सिसकारियाँ तेज़ होती जा रही थीं, उसकी मदहोश कर देने वाली सिस्कारियों से मेरा जोश और बढ़ता जा रहा था।
अब बबीता भी अपने चूतड़ उछाल - उछाल कर चुदवा रही थी और जोर से। और अन्दर डालो। आह्ह्हह्ह.. फाड़ दो मेरी बुर को.. पूरी आग बुझा दो।।
बबीता की ऐसी बातों से मेरा लंड और फनफ़ना रहा था। लगभग 20 मिनट की ताबड़तोड़ चुदाई के बाद मुझे लगा कि मैं हवा में उड़ने लगा हूँ, मैं बोला - बबीता मुझे कुछ हो रहा है। मेरे लंड से कुछ निकलने वाला है!! मैं फट जाऊँगा!!!
बबीता बोली - ये तो तेरा पानी है उसे मेरी बुर में ही निकालना मैं भी झड़ने वाली हूँ आह्ह्ह आह्ह्ह.. इस्स्स्स.. उम्म्मम्म.. में गई....
बस थोड़ी देर बाद मेरे लंड से पिचकारी निकल गई और मैंने बबीता की बुर को भर दिया। बबीता भी एकदम से तड़प उठी और मुझे अपने सीने से भींच लिया। उसकी बुर का दबाव मेरे लंड पर बढ़ गया जैसे वो मुझे निचोड़ रही हो। दो मिनट के इस तूफान के बाद हम दोनों शांत हो गए और निढाल हो कर लेट गए।
मेरी पहली चुदाई के अनुभव के बाद मुझमें इतनी भी ताकत नहीं बची थी कि मैं उठ सकूँ।
हम दोनों वैस ही नंगे एक - दूसरे से लिपट कर सो गए। एक घंटे बाद बबीता उठी और अपने कपड़े पहनने लगी। मेरा मूड फिर से चुदाई का होने लगा तो उसने मना कर दिया।
वो बोली - अभी तो पूरा हफ्ता बाकी है इतनी जल्दीबाज़ी मत करो मैं तुमको बहुत मज़ा दूँगी फिर पूरे हफ्ते हम दोनों ने अलग - अलग तरीके से चुदाई का खेल खेला
बबीता हमेशा मेरे सामने रहती थी जिसके कारण मेरे मन में बबीता की चुदाई के ख्याल आने लगे। जब भी वो झाड़ू - पोंछा करती, मैं चोरी - चोरी उसकी चूचियों को देखता था हर रात बबीता के बारे में ही सोच सोच कर मुठ्ठ मारता था।
मैं हमेशा बबीता को चोदने के बारे में सोचता तो रहता था पर कभी न मौका मिला न हिम्मत हुई। एक बार बबीता एक महीनों के लिए अपने गाँव गई हुई थी जब वो वापस आई तो पता चला कि उसकी शादी तय हो गई थी। मैं तो बबीता को देख कर दंग ही रह गया, हमेशा सलवार-कमीज़ पहनने वाली बबीता अब साड़ी में थी, उसकी चूचियाँ पहले से ज्यादा बड़ी लग रही थीं। शायद कसे हुए ब्लाउज के कारण या फिर सच में बड़ी हो गई थी। उसके चूतड़ पहले से ज्यादा मज़ेदार दिख रहे थे और बबीता की चाल के साथ उसकी बाल्टी बहुत मटकती थी।
बबीता जब से वापस आई थी उसका मेरे प्रति नजरिया ही बदल गया था। अब वो मेरे आस -पास ज्यादा मंडराती थी। झाड़ू - पोंछा करने के समय कुछ ज्यादा ही चूचियाँ झलकाती थी। मैं भी उसके मज़े ले रहा था पर मेरा लंड बहुत परेशान था उसे तो बस बबीता की चूत चाहिए थी। मैं अब मौके की तलाश में रहने लगा। कुछ दिनों के बाद मेरे मम्मी - पापा को किसी रिश्तेदार की शादी में एक हफ्ते के लिए जाना था। अब एक हफ्ते मैं और बबीता घर में अकेले रहने वाले थे।
हमारे घर वालों को हम पर कभी कोई शक नहीं था। उन्हें लगता था कि हम दोनों के बीच में ऐसा कुछ कभी नहीं हो सकता इसलिए वो निश्चिंत होकर शादी में चले गए।
जब मैं दोपहर को कॉलेज से वापस आया तो देखा की बबीता रसोई में थी, उसने केवल पेटीकोट और ब्लाउज पहना हुआ था। उस दिन गर्मी भी बहुत ज्यादा थी और बबीता से गर्मी शायद बर्दाश्त नहीं हो रही थी।
बबीता की गोरी कमर और मस्त चूतड़ों को देख कर मेरा लंड झटके देने लगा।
मैं आगे वाले कमरे में जाकर बैठ गया और बबीता को खाना लाने को कहा।
जब बबीता खाना ले कर आई तो मैंने देखा कि उसने गहरे गले का ब्लाउज पहना हुआ है जिसमें से उसकी आधी चूचियाँ बाहर दिख रही थीं।
उसकी गोरी गोरी चूचियों को देख कर मेरा लंड और भी कड़ा हो गया और मेरे पैंट में तम्बू बन गया।
मैं खाना खाने लगा और बबीता मेरे सामने सोफे पर बैठ गई, उसने अपना पेटीकोट कमर में खोंश रखा था जिससे उसकी चिकनी टाँगें घुटने तक दिख रही थीं।
खाना खाते हुए मेरी नज़र जब बबीता पर गई तो मेरे दिमाग सन्न रह गया। बबीता सोफे पर टाँगें फैला कर बैठी थी और उसका पेटीकोट जांघों तक उठा हुआ था। उसकी चिकनी जाँघों को देखकर मुझे लगा कि मैं पैंट में ही झड़ जाऊँगा।
उधर बबीता मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी, उसने पूछा और कुछ लोगे क्या विकास?
मैंने ‘ना’ में सर हिलाया और चुपचाप खाना खाने लगा।
खाना खाने के बाद मैं अपने कमरे में चला गया तो बबीता मेरे पीछे-पीछे आ गई।
उसने मुझसे पूछा - क्या हुआ विकास?? खाना अच्छा नहीं लगा क्या?
मैंने बोला - नहीं बबीता!!! खाना तो बहुत अच्छा था।
फिर बबीता बोली - फिर इतनी जल्दी कमरे में क्यों आ गए जो देखा वो अच्छा नहीं लगा क्या?
यह बोलते हुए बबीता ने अपनी बुर पर पेटीकोट के ऊपर से हाथ रख दिया।
अब मैं इतना तो बेवक़ूफ़ नहीं था कि इशारा भी नहीं समझता। मैं समझ गया कि बबीता भी चुदाई का खेल खेलना चाहती है मौका भी अच्छा है और लड़की भी चुदवाने को तैयार थी।
मैंने धीरे से आगे बढ़कर बबीता को अपनी बाँहों में भर लिया और बिना कुछ बोले उसके होंठों को चूमने लगा।
बबीता भी मुझसे लिपट गई और बेतहाशा मुझे चूमने लगी - विकास मैं तुम्हारी प्यास में मरी जा रही थी मुझे जवानी का असली मज़ा दे दो!!!
बबीता बोल रही थी!! मैंने बबीता को अपनी गोद में उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया।
फिर मैं उसके बगल में लेट कर उसके बदन से खेलने लगा। मैंने उसके ब्लाउज और पेटीकोट उतार दिए और खुद भी नंगा हो गया।
बबीता ने मेरे लंड को अपने हाथ में भर लिया और उससे खेलने लगी - हाय विकास!!! तुम्हारा लंड तो बड़ा मोटा है आज तो मज़ा आ जाएगा।
बबीता अब सिर्फ काली ब्रा और चड्डी में थी। उसके गोरे बदन पर काली ब्रा और चड्डी बहुत ज्यादा सेक्सी लग रही थी।
मैंने शुरूआत तो कर दी थी पर मैं अभी भी कुंवारा था लड़की चोदने का मुझे कोई अनुभव तो था नहीं।
शायद मेरी झिझक को बबीता समझ गई उसने बोला - विकास तुम परेशान मत हो मैं तुम्हें चुदाई का खेल सिखा दूँगी तुम बस वैसा करो!! जैसा मैं कहती हूँ!! दोनों को खूब मज़ा आएगा।
बबीता ने खुद अपनी ब्रा खोल कर हटा दी, उसके गोरे-गोरे चूचे आज़ाद हो कर फड़कने लगे, गोरी चूचियों पर गुलाबी निप्पल्स ऐसे लग रहे थे जैसे हिमालय की छोटी पर किसी ने चेरी का फल रख दिया हो।
बबीता ने मुझे अपनी चूचियों को चूसने के लिए कहा। मैंने उसकी दाईं चूची को अपने मुँह में भर लिया और बच्चों की तरह चूसने लगा साथ ही साथ मैं दूसरे हाथ से उसकी बाईं चूची को मसल रहा था। बबीता अपनी आँखें बंद कर के सिसकारियाँ भर रही थी। फिर मैंने धीरे-धीरे अपना हाथ उसकी चड्डी की तरफ बढ़ाया। बबीता ने चूतड़ उठा कर अपने चड्डी खोलने में मेरी मदद की। बबीता की बुर देख कर मैं दंग रह गया। एकदम गुलाबी!! चिकनी बुर थी उसकी!! झांटों का कोई नामो - निशान भी नहीं था।
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इस गुलाबी बुर के साथ मैं क्या करूँ। बबीता मेरी दुविधा को भांप गई। उसने मेरा मुँह पकड़ कर अपनी बुर पर चिपका दिया और बोली- विकास!! चाटो मेरी बुर को अपने जीभ से मेरी बुर को सहलाओ।
मैंने भी आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसकी बात मानी और उसकी नमकीन बुर को चाटने लगा। उसकी बुर का अलग ही स्वाद था ऐसा स्वाद जो मैंने जिंदगी में कभी नहीं चखा था क्योंकि वो स्वाद दुनिया में किसी और चीज में होती ही नहीं है।
मैं जानवरों की तरह उसकी बुर को चाट रहा था और अपने जीभ से उसकी गुलाबी बुर के भीतर का नमकीन रस पी रहा था।
बबीता की सिसकारियाँ बढ़ती ही जा रही थीं और उन्हें सुन-सुन कर मेरा लंड लोहे की तरह कड़ा हो गया था।
दस मिनट के बाद बबीता बोली- विकास अब मेरी बुर की खुजली बर्दाश्त नहीं हो रही!!! इसमें अपना लंड पेल दो और मेरी बुर की आग शांत करो।
मैंने जैसे ब्लू-फिल्मों में देखा था वैसे करने लगा, बबीता के दोनों पैरों को फैलाया और अपना लंड उसकी बुर में घुसाने की कोशिश करने लगा।
कुछ तो बबीता की बुर कसी हुई थी कुछ मुझे अनुभव नहीं था। इसलिए मेरी पूरे कोशिश के बावजूद भी मेरा लंड अन्दर नहीं जा रहा था।
मैं अपने आप भी झेंप सा गया, मेरे सामने बबीता अपनी टाँगों को फैला कर लेटी थी और मैं चाह कर भी उसे चोद नहीं पा रहा था।
बबीता मेरी बेचारगी पर हँस रही थी, वो बोली - अरे मेरे बुद्धू राजा!!! इतनी जल्दीबाज़ी करेगा तो कैसे घुसेगा!! जरा प्यार से कर!! थोड़ा अपने लंड पर क्रीम लगा!! और फिर मेरे छेद के मुँह पर अपना पप्पू टिका!! फिर मेरी कमर पकड़ के पूरी ताकत से पेल दे अपने हथियार को!!!
मैंने वैसे ही किया अपने लंड पर ढेर सारी क्रीम लगाई फिर उसकी दोनों टाँगों को पूरी तरह चौड़ा किया और उसकी बुर के मुँह पर अपने लंड का सुपारा टिका दिया।
बबीता की बुर बहुत गर्म थी ऐसा लग रहा था जैसे मैंने चूल्हे में लंड को डाल दिया हो।
फिर मैंने उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ा और अपनी पूरी ताकत से पेल दिया।
बबीता की बुर को चीरता हुआ मेरा लंड आधा घुस गया, बबीता दर्द से चिल्ला उठी उई.. माँ.. आराम से.. अभी मेरी बुर कुंवारी है। जरा प्यार से डालो!! चूत फाड़ दोगे क्या।
मैंने एक और जोर का धक्का लगाया और मेरा 8 इंच का लंड सरसराता हुआ बबीता की बुर में घुस गया।
बबीता बहुत जोर से चीख उठी। मैं घबरा गया। देखा तो उसकी बुर से खून निकलने लगा था।
मैंने डरते हुए पूछा - बबीता!! बहुत दर्द हो रहा है क्या? मैं निकाल लूँ बाहर?
बबीता कराहते हुए बोली - ओह्ह.. अरे नहीं.. ये तो पहली चुदाई का दर्द है ये तो हर लड़की को होता है पर बाद में जो मज़ा आता है। उसके सामने ये दर्द कुछ नहीं है बबीता के कहने पर मैंने धीरे-धीरे धक्के लगाना शुरू कर दिया। बबीता की बुर से निकलने वाले काम रस से उसकी बुर बहुत चिकनी हो गई थी और मेरा लंड अब आसानी से अन्दर - बाहर हो रहा था। मैंने धीरे - धीरे पेलने की रफ़्तार बढ़ा दी। हर धक्के के साथ बबीता की मादक सिसकारियाँ तेज़ होती जा रही थीं, उसकी मदहोश कर देने वाली सिस्कारियों से मेरा जोश और बढ़ता जा रहा था।
अब बबीता भी अपने चूतड़ उछाल - उछाल कर चुदवा रही थी और जोर से। और अन्दर डालो। आह्ह्हह्ह.. फाड़ दो मेरी बुर को.. पूरी आग बुझा दो।।
बबीता की ऐसी बातों से मेरा लंड और फनफ़ना रहा था। लगभग 20 मिनट की ताबड़तोड़ चुदाई के बाद मुझे लगा कि मैं हवा में उड़ने लगा हूँ, मैं बोला - बबीता मुझे कुछ हो रहा है। मेरे लंड से कुछ निकलने वाला है!! मैं फट जाऊँगा!!!
बबीता बोली - ये तो तेरा पानी है उसे मेरी बुर में ही निकालना मैं भी झड़ने वाली हूँ आह्ह्ह आह्ह्ह.. इस्स्स्स.. उम्म्मम्म.. में गई....
बस थोड़ी देर बाद मेरे लंड से पिचकारी निकल गई और मैंने बबीता की बुर को भर दिया। बबीता भी एकदम से तड़प उठी और मुझे अपने सीने से भींच लिया। उसकी बुर का दबाव मेरे लंड पर बढ़ गया जैसे वो मुझे निचोड़ रही हो। दो मिनट के इस तूफान के बाद हम दोनों शांत हो गए और निढाल हो कर लेट गए।
मेरी पहली चुदाई के अनुभव के बाद मुझमें इतनी भी ताकत नहीं बची थी कि मैं उठ सकूँ।
हम दोनों वैस ही नंगे एक - दूसरे से लिपट कर सो गए। एक घंटे बाद बबीता उठी और अपने कपड़े पहनने लगी। मेरा मूड फिर से चुदाई का होने लगा तो उसने मना कर दिया।
वो बोली - अभी तो पूरा हफ्ता बाकी है इतनी जल्दीबाज़ी मत करो मैं तुमको बहुत मज़ा दूँगी फिर पूरे हफ्ते हम दोनों ने अलग - अलग तरीके से चुदाई का खेल खेला
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